Saturday, 9 December 2017

भारतीय संविधान एवं लोकतंत्र पर वर्तमान कविता.......

मैं भारत का संविधान हूँ।............      

मेरा अंतर्मन घायल है दुःख की गाँठें खोल रहा हूँ।
मैं शक्ति का अमर गर्व हूँ आजादी का विजय पर्व हूँ।।

पहले राष्ट्रपति का गुण हूँ बाबा भीमराव का मन हूँ।
मैं बलिदानों का चन्दन हूँ कर्त्तव्यों का अभिनन्दन हूँ।।

लोकतंत्र का उदबोधन हूँ अधिकारों का संबोधन हूँ।
मैं आचरणों का लेखा हूँ कानूनी लछमन रेखा हूँ।।

कभी-कभी मैं रामायण हूँ कभी-कभी गीता होता हूँ।
रावण वध पर हँस लेता हूँ दुर्योधन हठ पर रोता हूँ।।

मेरे वादे समता के हैं दीन दुखी से ममता के हैं।
कोई भूखा नहीं रहेगा कोई आँसू नहीं बहेगा।।

मेरा मन क्रन्दन करता है जब कोई भूखा मरता है।
मैं जब से आजाद हुआ हूँ और अधिक बर्बाद हुआ हूँ।।

मैं ऊपर से हरा-भरा हूँ संसद में सौ बार मरा हूँ।
मैंने तो उपहार दिए हैं मौलिक भी अधिकार दिए हैं।।

धर्म कर्म संसार दिया है जीने का अधिकार दिया है।
सबको भाषण की आजादी कोई भी बन जाये गाँधी।।

लेकिन तुमने अधिकारों का मुझमे लिक्खे उपचारों का।
क्यों ऐसा उपयोग किया है सब नाजायज भोग किया है।।

मेरा यूँ अनुकरण किया है जैसे सीता हरण किया है।
मैंने तो समता सौंपी थी तुमने फर्क व्यवस्था कर दी।।

मैंने न्याय व्यवस्था दी थी तुमने नर्क व्यवस्था कर दी।
हर मंजिल थैली कर डाली गंगा भी मैली कर डाली।।

शांति व्यवस्था हास्य हो गयी विस्फोटों का भाष्य हो गयी।
आज अहिंसा बनवासी है कायरता के घर दासी है।।

न्याय व्यवस्था भी रोती है गुंडों के घर में सोती है।
पूरे कांप रहे आधों से राजा डरता है प्यादों से।।

गाँधी को गाली मिलती है डाकू को ताली मिलती है।
क्या अपराधिक चलन हुआ है मेरा भी अपहरण हुआ है।।

मैं चोटिल हूँ क्षत विक्षत हूँ मैंने यूँ आघात सहा है।
जैसे घायल पड़ा जटायु हारा थका कराह रहा है।।

जिन्दा हूँ या मरा पड़ा हूँ, अपनी नब्ज टटोल रहा हूँ।
मैं भारत का संविधान हूँ लालकिले से बोल रहा हूँ।।

मेरे बदकिस्मत लेखे हैं मैंने काले दिन देखें हैं।
मेरे भी जज्बात जले हैं जब दिल्ली गुजरात जले हैं।
हिंसा गली-गली देखी है मैंने रेल जली देखी है।।

संसद पर हमला देखा है अक्षरधाम जला देखा है।
मैं दंगों में जला पड़ा हूँ आरक्षण से छला पड़ा हूँ।।

मुझे निठारी नाम मिला है खूनी नंदीग्राम मिला है।
माथे पर मजबूर लिखा है सीने पर सिंगूर लिखा है।।

गर्दन पर जो दाग दिखा है ये लश्कर का नाम लिखा है।
मेरी पीठ झुकी दिखती है मेरी सांस रुकी दिखती है।।

आँखें गंगा यमुना जल हैं मेरे सब सूबे घायल हैं।
माओवादी नक्सलवादी घायल कर डाली आजादी।।

पूरा भारत आग हुआ है जलियांवाला बाग़ हुआ है।
मेरा गलत अर्थ करते हो सब गुणगान व्यर्थ करते हो।।

खूनी फाग मनाते तुम हो मुझ पर दाग लगाते तुम हो।
मुझको वोट समझने वालो मुझमे खोट समझने वालो।।

पहरेदारो आँखें खोलो दिल पर हाथ रखो फिर बोलो।
जैसा हिन्दुस्तान दिखा है वैसा मुझमे कहाँ लिखा है।।

वर्दी की पड़ताल देखकर नाली में कंकाल देखकर।
मेरे दिल पर क्या बीती है जिसमे संप्रभुता जीती है।।

जब खुद को जलते देखा है धुर्व तारा चलते देखा है।
जनता मौन साध बैठी है सत्ता हाथ बांध बैठी है।।

चौखट पर आतंक खड़ा है दिल में भय का डंक गड़ा है।
कोई खिड़की नहीं खोलता आँसू भी कुछ नहीं बोलता।।

सबके आगे प्रश्न खड़ा है देश बड़ा या स्वार्थ बड़ा है।
इस पर भी खामोश जहां है तो फिर मेरा दोष कहाँ है।।

संसद मेरा अपना दिल है तुमने चकनाचूर कर दिया।
राजघाट में सोया गाँधी सपनों से भी दूर कर दिया।।

राजनीति जो कर दे कम है नैतिकता का किसमें दम है।
आरोपी हो गये उजाले मर्यादा है राम हवाले।

भाग्य वतन के फूट गए हैं दिन में तारे टूट गए हैं।
मेरे तन मन डाले छाले जब संसद में नोट उछाले।।

जो भी सत्ता में आता है वो मेरी कसमें खाता है।
सबने कसमों को तोडा है मुझको नंगा कर छोड़ा है।।

जब-जब कोई बम फटता है तब-तब मेरा कद घटता है।
ये शासन की नाकामी है पर मेरी तो बदनामी है।।

दागी चेहरों वाली संसद चम्बल घाटी दीख रही है।
सांसदों की आवाजों में हल्दी घाटी चीख रही है।।

मेरा संसद से सड़कों तक चीर हरण जैसा होता है।
चक्र सुदर्शनधारी बोलो क्या कलयुग ऐसा होता है।।

मुझे तवायफ के कोठों की एक झंकार बना डाला है।
वोटों के बदले नोटों का एक दरबार बना डाला है।।

मेरे तन में अपमानों के भाले ऐसे गड़े हुए हैं।
जैसे शर सैया के ऊपर भीष्म पितामह पड़े हुए हैं।।

मुझको धृतराष्ट्र के मन का गौरखधंधा बना दिया है।
पट्टी बांधे गांधारी माँ जैसा अँधा बना दिया है।।

मेरे पहरेदारों ने ही पथ में बोये ऐसे काँटें।
जैसे कोई बेटा बूढी माँ को मार गया हो चांटे।।

छोटे कद के अवतारों ने मुझको बौना समझ लिया है।
अपनी-अपनी खुदगर्जी के लिए खिलौना समझ लिया है।।

मैं लहु में लथ पथ होकर जनपथ हर पथ डौल रहा हूँ।
शायद नया खून जागेगा इसीलिये मैं व्यथा खौल रहा हूँ।।

                   ............. लालकिले से बोल रहा हूँ।।

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Wednesday, 18 October 2017

सभी देशवासियों को दीपावली पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं...........

सभी मित्रगण भाई बहनों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

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Wednesday, 4 October 2017

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (राष्ट्रीय सेवा योजना)

मत मारो तुम कोख में इसको।
इसे  सुंदर  जग  में आने दो।।

छोड़ो तुम अपनी सोच ये छोटी।
इक  माँ को  ख़ुशी  मनाने दो।।

बेटी के आने  पर अब तुम।
घर में घी के दिये जलाओ।।

आज ये संदेशा पूरे जग में फैलाओ।
बेटी    बचाओ    बेटी    पढ़ाओ।।

लक्ष्मी का कोई रूप कहे है।
कोई  कहता  दुर्गा  काली।।

फिर क्यों न कोई चाहे घर में।
इक  बिटिया  प्यारी-प्यारी।।

धन्य ये कर दे जीवन सबका।
जो तुम इस पर प्यार लुटाओ।।

आज ये संदेशा पूरे जग में फैलाओ।
बेटी     बचाओ     बेटी     पढ़ाओ।।

ये आकाश में गोते लगाती।
यही तो कहलाती मर्दानी।।

यही तो है कल्पना चावला।
यही तो है झाँसी की रानी।।

इनको देकर के पूरी शिक्षा।
अपना   कर्तव्य   निभाओ।।

आज ये संदेशा पूरे जग में फैलाओ।
बेटी     बचाओ     बेटी     पढ़ाओ।।

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Sunday, 1 October 2017

पापा की परी हूँ मैं......एक मार्मिक कविता

मैं   भी   लेती   श्वास   हूँ ।
पत्थर   नहीं   इंसान   हूँ ।।

कोमल   मन   है   मेरा ।
वही  भोला  सा  है चेहरा ।।

जज़बातों   में   जीती   हूँ ।
बेटा   नहीं,  पर   बेटी   हूँ ।।

कैसे   दामन   छुड़ा   लिया ।
जीवन के पहले ही मिटा दिया।।

तुझ   से   ही   बनी   हूँ ।
बस  प्यार  की  भूखी  हूँ ।।

जीवन    पार    लगा    दूंगी ।
अपनालों, बेटा भी बन जाऊँगी ।।

दिया   नहीं   कोई   मौका ।
बस  पराया  बनाकर  सोचा ।।

एक   बार  गले  से  लगा  लो ।
फिर चाहे हर कद पे आज़मालो ।।

हर  लड़ाई  जीत  कर  दिखाऊंगी ।
मैं अग्नि में जलकर भी जी जाऊँगी ।।

चंद  लोगो  की सुन ली  तुमने ।
मेरी   पुकार   ना   सुनी  तुमने ।।

मैं  बोझ  नहीं, भविष्य  हूँ ।
बेटा   नहीं,  पर   बेटी   हूँ ।।

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Monday, 14 August 2017

सोनै री चिड़कली रै म्हारो प्यारो देसड़ो...... भारत भूमि की छवि दर्शाता राजस्थानी लोक गीत।

सौने री चिड़कली रे, प्यारो म्हारो देसड़ो।
अठै नर वीरां री खान जगत अगवाणी रै।।

दूध  दही  री  अठै  नदियाँ  बहती।
रिध  सिध  साथै  नव  निध  रहती।।

होती   अठै   मोकळी   गायां।
रहती   फळफूलां   री   छायां।।

करसा  अन्न  घणो  निपजाता।
बांनैं   देख   देव   हरसाता।।

शस्य श्यामला रै  भारत  भोम है।
ई रो अन्नपूर्णा रूप, दुनियां जाणी रै।।

सौने री चिड़कली रे, प्यारो म्हारो देसड़ो।
अठै नर वीरां री खान जगत अगवाणी रै।।

आ   धरती   नर   नाहर  जाया।
नारयां भी रण में हाथ दिखाया।।

सूरा   लड़ता   शीश   कटयोड़ा।
देख्यां   पीछै   नहीं   हटयोड़ा।।

रण  में  सदा  विजय  ही  पाई।
सारै   धरम   ध्वजा   फहराई।।

आ तो करम भौम है रै भगवान री।
लियो बार बार अवतार अमर कहाणी रै।।

सौने री चिड़कली रे, प्यारो म्हारो देसड़ो।
अठै नर वीरां री खान जगत अगवाणी रै।।

आ   धरती।  है   ऋषि   मुनियां   री।
चिन्ता   करती   सब   दुनियां   री।।

गूंजी    अठै   वेद   री    वाणी।
गीता   रण   में   पड़ी  सुणाणी।।

विकस्यो  हो  विज्ञान  अठै  ही।
जलमी  सारी  कळा  अठै  ही।।

आ तो जगत गुरु ही रै भारत भारती।
अब तन मन जीवण वार बा छवि ल्याणी रै।।

सोनै री चिड़कली रै प्यारो म्हारो देसड़ो।
अठै नर वीरां री खान जगत आगवानी रै।।

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Saturday, 5 August 2017

फ्रेंडशिप डे........

ऐसा एक दोस्त चाहिए, ऐसा प्यार चाहिए।
मरते दम तक माता पिता की सेवा चाहिए।।

नो महीने पेट में पालकर बोझ ढोया था।
सच्चा प्यार उस माँ ने किया था।।

नहीं था कोई अस्तित्व मेरा इस जग में।
सांसारिक पहचान कराने वाला वो पिता चाहिए।।

जब जब रूठा मैं, मतलब मेरा अपना था।
प्यार से सहलाया जब, उस माँ की ममता ने।।

ठोकर खाकर गिरता था मरहम लगाने वाला दोस्त नहीं।
पकड़कर अंगुली खड़ा करने वाला वो पिता चाहिए।।

टूट गया दिल, इस फरेबी की दुनियां में।
सच्चे दोस्त माता पिता से बढ़कर दुनियां में नहीं।।

ऐसा एक दोस्त चाहिए, ऐसा प्यार चाहिए।
माता पिता की सेवा करे, एक हमसफर चाहिए।।

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Monday, 3 July 2017

देश की हालत पर मेरा मन रो रहा है...

मेरे देश का ये नौजवा, सिगरेट के धुएं में खो रहा है ।
वक्त की फिक्र छोड़ कर, गहरी नींद में सो रहा है ।।

फुटपाथ भरा है बचपन से, ये भूखा नंगा रो रहा है ।
कैसे बचाऊ इस यौवन को मैं, ये नर्क के गर्त में खो रहा है ।।

रोज गोलियां चलती है यहाँ पर, अपना ही अपने खो रहा है ।
बम की नित नित बौछारों से, विध्वंश ये कैसा हो रहा है ।।

सीताओ के संग ये देखो, लव-कुश का अपहरण हो रहा है ।
अस्मत लुटती है बहनों की, वहशीपन नित ये हो रहा है ।।

कुर्सी का भूखा इस देश का नेता, बीज नफरत के बो रहा है ।
गाँधी नेहरु के इस देश का, हाल ये कैसा हो रहा है ।।

नोट के बदले जमीर बिकी है, लोकतंत्र ये खो रहा है ।
मेरे देश की ऐसी हालत से, मेरा मन कितना रो रहा है ।।

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Sunday, 18 June 2017

फादर्स डे.........मेरे पिताजी पर कविता

जब मैं छोटा था तब छोटी से बड़ी चीजों के लिए पापाजी को बोल दिया करता था। मेरे पिताजी हर मांग को पूरी करते थे।
जब मैं बड़ा हुआ तब अहसास हुआ कि पिताजी के ऊपर कितनी जिम्मेदारियां होती हैं।

आज मैं जो कुछ भी हूँ उसका सम्पूर्ण श्रेय पिताजी को देता हूँ।

मेरे पिताजी पर कुछ पंक्तियां लिख रहा हूँ.........
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पिता एक उम्मीद है, एक आस है।
परिवार की हिम्मत और विश्वास है।।

बाहर से सख्त अंदर से नर्म है।
उसके दिल में दफन कई मर्म हैं।।

पिता संघर्ष की आंधियों में हौसलों की दीवार है।
परेशानियों से लड़ने को दो धारी तलवार है।।

बचपन में खुश करने वाला खिलौना है।
नींद लगे तो पेट पर सुलाने वाला बिछौना है।।

पिता जिम्मेवारियों से लदी गाड़ी का सारथी है।
सबको बराबर का हक़ दिलाता यही एक महारथी है।।

सपनों को पूरा करने में लगने वाली जान है।
इसी से तो माँ और बच्चों की पहचान है।।

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Tuesday, 30 May 2017

मैं झाँसी वाली रानी हूँ......तुम्हे जगाने आई हूँ।।

तुम भूल गए शायद मुझको,

मैं झाँसी वाली रानी हूँ,

जो नपुंसकों पर भारी थी,

मैं वो मर्दानी हूँ।

लुटती अस्मत, लगती कीमत,

ये नारी की कैसी किस्मत ?

आजाद देश के वीरों से,

कुछ प्रश्न पूछने आई हूँ……!

तब आजादी की बीज बनी,

अब तुम्हें जगाने आई हूँ!!

आजाद देश में नारी गुलाम,

ये किसने रीत चलाई है,

क्या तुमने अब भी गद्दारों की,

चिता नहीं जलाई है ?

भारत की हर एक स्त्री को फिर,

लक्ष्मीबाई आज बना दो तुम।

सभी स्त्रियों के स्वाभिमान को,

फिर से आज जगा दो तुम।।

शस्त्र-शास्त्र से सुसज्जित कर दो,

हर-एक घर-आँगन को,

निडर और निर्भय कर दो,

देश के हर-एक वन-उपवन को।

बच्चों के खेल-खिलौनों में शामिल,

कर दो झाँसी की तलवार को।

बच्चों के नस-नस में भर दो,

निडरता और स्वाभिमान को।।

किताबों से बाहर निकालो मुझे और,

लिखने दो शौर्य गाथाएँ अपने घर-आँगन में।

ताकि तुम गर्व से कह सको कि,

मैं तेरी मनु -- छबिली हूँ……!

अब ढूँढो मुझको अपने घर-आंगन में,

मैं लक्ष्मीबाई अलबेली हूँ……!!

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पशुबैन पर भड़की ममता बनर्जी.........

ममता बनर्जी का सिर चाहिए, एक मिलेंगे लाख।
ना काटा शीश तो, खुद कटकर हो जाओ सब खाक।।

बेजुबान जानवरों को तुम काटो, हमने बैन लगाया है।
करो तुम फतवा जारी मुस्लिमों, जवाब हमारा तैयार है।।

आया रमजान झूम कर, हिन्दुओ का खून खोलकर।
ना कटेंगे बेजुबान, सुने मोदी जी का खत पढ़कर।।

भड़की तृणमूल कांग्रेस, ममता बनर्जी हुई बेकरार।
हुए कत्लखाने बन्द, सपना होता दिखा साकार।।

रमजान में ही बन्द किये, हमारे सौदे किये निराधार।
बोली ममता हाय रे मोदी, अब कैसे करेंगे ये पापाचार।।

बोले मोदी सुन ममता, ये तो अभी शुरू हुआ है।
गौवंश की दशा का, कुछ तो सुधार हुआ है।।

मैं हिंदुओं के साथ हूँ, मनीष कहे सुनो सरकार।
अब मुस्लिम मुक्त भारत का, सपना मेरा करो साकार।।

         🚩🚩जय श्री महाकाल🚩🚩

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Saturday, 27 May 2017

मैं अबला नारी क्या लिखूँ अब..........!!

अबला सबला कहीं निर्मला , गृह लक्ष्मी की मिली उपाधि।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

पिया की वह कहीं प्रेयसी , जन जन के हैं रिश्ते भारी।
सदा प्रताड़ित होती जग में, तस्वीरों में पुजती नारी।।

रिश्तों की डोरी में बंधकर, जंजीरें जकड़े हितकारी।
डायन कुलटा कोई कहे, कोई कहे नागिन विषधारी।।

जन्मदात्री वही सभी की, फिर क्यूँ कहलाये है व्याधि।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

दीवारों की शोभा खातिर, तस्वीरों में नग्न है नारी।
विवश जिन्दगी जर्जर जीवन, वैश्यालयों में मग्न है नारी।।

कभी यहाँ और अभी वहाँ, सभी जगह लुटती बेचारी।
खरीद फरोख्त करते हैं इसकी, जिस्मों के ये कारोबारी।।

बचपन नहीं सुरक्षित इसका, जुल्म की वो उठ्ठी है आंधी।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

नहीं सुरक्षित आज कोख में, हाय अभागी कैसी नारी,
रक्षक ही भक्षक बन जाए, कैसे भरे आज किलकारी।।

कौन उपाय करो जग माहीं, कैसे जाए दशा सुधारी।
पश्चिम के ये चमत्कार हैं, जिन पर अब भारत बलिहारी।।

बिन नारी जग संभव ना है, फिर भी है दुनिया अत्याचारी।मैं मनीष सैनी आपको क्या समझाऊं बात जरा सी।।

अबला सबला कहीं निर्मला, गृह लक्ष्मी की मिली उपाधि।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

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Monday, 22 May 2017

क्रन्तिकारी कविता........मर मर अमर कहाऊंगा। !!

अमर भूमि से प्रकट हुआ हूं, मर-मर अमर कहाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूंगा, चैन न कहीं मैं पाऊंगा।।

तुम हो जालिम दगाबाज, मक्कार, सितमगर, अय्यारे।
डाकू, चोर, गिरहकट, रहजन, जाहिल, कौमी गद्दारे।।

खूंगर तोते चश्म, हरामी, नाबकार और बदकारे।
दोजख के कुत्ते खुदगर्जी, नीच जालिमों हत्यारे।।

अब तेरी फरेबबाजी से रंच न दहशत खाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

तुम्हीं हिंद में बन सौदागर आए थे टुकड़े खाने।
मेरी दौलत देख देख के, लगे दिलों में ललचाने।।

लगा फूट का पेड़ हिंद में अग्नी ईर्ष्या बरसाने।
राजाओं के मंत्री फोड़े, लगे फौज को भड़काने।।

तेरी काली करतूतों का भंडा फोड़ कराऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

हमें फरेबो जाल सिखा कर, भाई भाई लड़वाया।
सकल वस्तु पर कब्जा करके हमको ठेंगा दिखलाया।।

चर्सा भर ले भूमि, भूमि भारत का चर्सा खिंचवाया।
बिन अपराध हमारे भाई को शूली पर चढ़वाया।।।

एक एक बलिवेदी पर अब लाखों शीश चढ़ाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

बंग-भंग कर, नन्द कुमार को किसने फांसी चढ़वाई।
किसने मारा खुदी राम और झांसी की लक्ष्मीबाई।।

नाना जी की बेटी मैना किसने जिंदा जलवाई।
किसने मारा टिकेन्द्र जीत सिंह, पद्मनी, दुर्गाबाई।।

अरे अधर्मी इन पापों का बदला अभी चखाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

किसने श्री रणजीत सिंह के बच्चों को कटवाया था।
शाह जफर के बेटों के सर काट उन्हें दिखलाया था।।

अजनाले के कुएं में किसने भोले भाई तुपाया था।
अच्छन खां और शम्भु शुक्ल के सर रेती रेतवाया था।।

इन करतूतों के बदले लंदन पर बम बरसाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

पेड़ इलाहाबाद चौक में अभी गवाही देते हैं।
खूनी दरवाजे दिल्ली के घूंट लहू पी लेते हैं।।

नवाबों के ढहे दुर्ग, जो मन मसोस रो देते हैं।
गांव जलाये ये जितने लख आफताब रो लेते हैं।।

उबल पड़ा है खून आज एक दम शासन पलटाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

अवध नवाबों के घर किसने रात में डाका डाला था।
वाजिद अली शाह के घर का किसने तोड़ा ताला था।।

लोने सिंह रुहिया नरेश को किसने देश निकाला था।
कुंवर सिंह बरबेनी माधव राना का घर घाला था।।

गाजी मौलाना के बदले तुझ पर गाज गिराऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

किसने बाजी राव पेशवा गायब कहां कराया था।
बिन अपराध किसानों पर कस के गोले बरसाया था।।

किला ढहाया चहलारी का राज पाल कटवाया था।
धुंध पंत तातिया हरी सिंह नलवा गर्द कराया था।।

इन नर सिंहों के बदले पर नर सिंह रूप प्रगटाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

डाक्टरों से चिरंजन को जहर दिलाने वाला कौन ?
पंजाब केसरी के सर ऊपर लट्ठ चलाने वाला कौन ?

पितु के सम्मुख पुत्र रत्न की खाल खिंचाने वाला कौन ?
थूक थूक कर जमीं के ऊपर हमें चटाने वाला कौन ?

एक बूंद के बदले तेरा घट पर खून बहाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

किसने हर दयाल, सावरकर अमरीका में घेरवाया है।
वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र से प्रिय भारत छोड़वाया है।।

रास बिहारी, मानवेन्द्र और महेन्द्र सिंह को बंधवाया है।
अंडमान टापू में बंदी देशभक्त सब भेजवाया है।।

अरे क्रूर ढोंगी के बच्चे तेरा वंश मिटाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

अमृतसर जलियान बाग का घाव भभकता सीने पर।
देशभक्त बलिदानों का अनुराग धधकता सीने पर।।

गली नालियों का वह जिंदा रक्त उबलता सीने पर।
आंखों देखा जुल्म नक्श है क्रोध उछलता सीने पर।।

दस हजार के बदले तेरे तीन करोड़ बहाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

     जय माँ भारती !.............जय मातृभूमि की !!

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Saturday, 20 May 2017

हिन्दुस्तान तो होगा पाकिस्तान नहीं होगा......

किसी सुन्दरी के श्रृंगार के बन्द नही लिख सकता मैं।
हास्य,विरह व करुणा के छन्द नही लिख सकता मैं।।

जब आंखों मे बसीं तस्वीरें उन वीरों के शहादत की।
तो-अब भ्रमर बन पुष्पों की सुगन्ध नहीं लिख सकता मैं।।

देश की रक्षा करते करते निज प्राणों को भी वार दिया।
वतन के वीर जवानों ने अपना सर्वस्व निसार दिया।।

मध्य रात्रि चोरी से छिपकर दुश्मन ने है वार किया।
तब घात लगाकर हमला करके पीछे से आ मार दिया।।

एक मास मे पांच बार है संघर्ष विराम जो तोड रहे।
इस पापी नापाक पाक को क्यों अब भी हो छोड रहे।।

अरे-आदेश थमा दो सेनाओं को अब भी क्यों मुंह मोड रहे।
अब क्यों नही जरदारी शरीफ की गर्दन न जाय मरोड रहे।।

मुठ्ठी भर कुत्तों को शामिल करके शेरों को ललकारा है।
किसके बहकावे मे आकर फिर हिन्दुस्तान को ललकारा है।।

संसद की सरकार अगर थोडी सी हिम्मत कर जाये।
अबकी एक बार हमला करने को सहमत कर जाये।।

सौगन्ध शहीद वीर जवानों की द्रृश्य बदल अब जायेगा।
इस्लामाबाद,काश्मीर,करांची तक ये तिरंगा लहरायेगा।।

अबकी युद्ध हुआ गर तो अब नरसंहार बडा भीषण होगा।
दुनिया से पाक मिटाने को यही हर सैनिक का प्रण होगा।।

नापाक पाक को काट काटकर वायस श्रगाल खिलायेंगे।
इन्दुस सतलज चेनाब से हम तेरे लहू की धार बहायेंगे।।

काटे थे शीश जवानो के तो इसका हश्र बडा दुखदायी होगा।
ये अपना वजूद मिटाने का अब तू खुद ही सौदायी होगा।।

वो दो वीरों के शीश नही थे वो भारत मां की आन थी।
देश प्रेम का लहू था उनमे सेवा मे बसती जान थी।।

अब उन दो शीशों के बदले मे हम दो हजार उतारेंगे।
बाकी को शीश सहित ही हम घर घर मे जाकर मारेंगे।।

तेरा सबकी आंखों के आगे ही तब अंतिम वो क्षण होगा।
तेरा नक्शे से नाम मिटाने को ये बिना रुके ही रण होगा।।

उस युद्ध अंत मे यह तय है कि तब शमशान वहीं होगा।
पूरी दुनिया के नक्शे मे ही फिर पाकिस्तान नही होगा।।

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Manish Saini
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