Tuesday, 30 May 2017

मैं झाँसी वाली रानी हूँ......तुम्हे जगाने आई हूँ।।

तुम भूल गए शायद मुझको,

मैं झाँसी वाली रानी हूँ,

जो नपुंसकों पर भारी थी,

मैं वो मर्दानी हूँ।

लुटती अस्मत, लगती कीमत,

ये नारी की कैसी किस्मत ?

आजाद देश के वीरों से,

कुछ प्रश्न पूछने आई हूँ……!

तब आजादी की बीज बनी,

अब तुम्हें जगाने आई हूँ!!

आजाद देश में नारी गुलाम,

ये किसने रीत चलाई है,

क्या तुमने अब भी गद्दारों की,

चिता नहीं जलाई है ?

भारत की हर एक स्त्री को फिर,

लक्ष्मीबाई आज बना दो तुम।

सभी स्त्रियों के स्वाभिमान को,

फिर से आज जगा दो तुम।।

शस्त्र-शास्त्र से सुसज्जित कर दो,

हर-एक घर-आँगन को,

निडर और निर्भय कर दो,

देश के हर-एक वन-उपवन को।

बच्चों के खेल-खिलौनों में शामिल,

कर दो झाँसी की तलवार को।

बच्चों के नस-नस में भर दो,

निडरता और स्वाभिमान को।।

किताबों से बाहर निकालो मुझे और,

लिखने दो शौर्य गाथाएँ अपने घर-आँगन में।

ताकि तुम गर्व से कह सको कि,

मैं तेरी मनु -- छबिली हूँ……!

अब ढूँढो मुझको अपने घर-आंगन में,

मैं लक्ष्मीबाई अलबेली हूँ……!!

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पशुबैन पर भड़की ममता बनर्जी.........

ममता बनर्जी का सिर चाहिए, एक मिलेंगे लाख।
ना काटा शीश तो, खुद कटकर हो जाओ सब खाक।।

बेजुबान जानवरों को तुम काटो, हमने बैन लगाया है।
करो तुम फतवा जारी मुस्लिमों, जवाब हमारा तैयार है।।

आया रमजान झूम कर, हिन्दुओ का खून खोलकर।
ना कटेंगे बेजुबान, सुने मोदी जी का खत पढ़कर।।

भड़की तृणमूल कांग्रेस, ममता बनर्जी हुई बेकरार।
हुए कत्लखाने बन्द, सपना होता दिखा साकार।।

रमजान में ही बन्द किये, हमारे सौदे किये निराधार।
बोली ममता हाय रे मोदी, अब कैसे करेंगे ये पापाचार।।

बोले मोदी सुन ममता, ये तो अभी शुरू हुआ है।
गौवंश की दशा का, कुछ तो सुधार हुआ है।।

मैं हिंदुओं के साथ हूँ, मनीष कहे सुनो सरकार।
अब मुस्लिम मुक्त भारत का, सपना मेरा करो साकार।।

         🚩🚩जय श्री महाकाल🚩🚩

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Saturday, 27 May 2017

मैं अबला नारी क्या लिखूँ अब..........!!

अबला सबला कहीं निर्मला , गृह लक्ष्मी की मिली उपाधि।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

पिया की वह कहीं प्रेयसी , जन जन के हैं रिश्ते भारी।
सदा प्रताड़ित होती जग में, तस्वीरों में पुजती नारी।।

रिश्तों की डोरी में बंधकर, जंजीरें जकड़े हितकारी।
डायन कुलटा कोई कहे, कोई कहे नागिन विषधारी।।

जन्मदात्री वही सभी की, फिर क्यूँ कहलाये है व्याधि।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

दीवारों की शोभा खातिर, तस्वीरों में नग्न है नारी।
विवश जिन्दगी जर्जर जीवन, वैश्यालयों में मग्न है नारी।।

कभी यहाँ और अभी वहाँ, सभी जगह लुटती बेचारी।
खरीद फरोख्त करते हैं इसकी, जिस्मों के ये कारोबारी।।

बचपन नहीं सुरक्षित इसका, जुल्म की वो उठ्ठी है आंधी।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

नहीं सुरक्षित आज कोख में, हाय अभागी कैसी नारी,
रक्षक ही भक्षक बन जाए, कैसे भरे आज किलकारी।।

कौन उपाय करो जग माहीं, कैसे जाए दशा सुधारी।
पश्चिम के ये चमत्कार हैं, जिन पर अब भारत बलिहारी।।

बिन नारी जग संभव ना है, फिर भी है दुनिया अत्याचारी।मैं मनीष सैनी आपको क्या समझाऊं बात जरा सी।।

अबला सबला कहीं निर्मला, गृह लक्ष्मी की मिली उपाधि।
नारी फिर भी क्यूँ है दासी, नारी फिर भी क्यूँ है दासी।।

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Monday, 22 May 2017

क्रन्तिकारी कविता........मर मर अमर कहाऊंगा। !!

अमर भूमि से प्रकट हुआ हूं, मर-मर अमर कहाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूंगा, चैन न कहीं मैं पाऊंगा।।

तुम हो जालिम दगाबाज, मक्कार, सितमगर, अय्यारे।
डाकू, चोर, गिरहकट, रहजन, जाहिल, कौमी गद्दारे।।

खूंगर तोते चश्म, हरामी, नाबकार और बदकारे।
दोजख के कुत्ते खुदगर्जी, नीच जालिमों हत्यारे।।

अब तेरी फरेबबाजी से रंच न दहशत खाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

तुम्हीं हिंद में बन सौदागर आए थे टुकड़े खाने।
मेरी दौलत देख देख के, लगे दिलों में ललचाने।।

लगा फूट का पेड़ हिंद में अग्नी ईर्ष्या बरसाने।
राजाओं के मंत्री फोड़े, लगे फौज को भड़काने।।

तेरी काली करतूतों का भंडा फोड़ कराऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

हमें फरेबो जाल सिखा कर, भाई भाई लड़वाया।
सकल वस्तु पर कब्जा करके हमको ठेंगा दिखलाया।।

चर्सा भर ले भूमि, भूमि भारत का चर्सा खिंचवाया।
बिन अपराध हमारे भाई को शूली पर चढ़वाया।।।

एक एक बलिवेदी पर अब लाखों शीश चढ़ाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

बंग-भंग कर, नन्द कुमार को किसने फांसी चढ़वाई।
किसने मारा खुदी राम और झांसी की लक्ष्मीबाई।।

नाना जी की बेटी मैना किसने जिंदा जलवाई।
किसने मारा टिकेन्द्र जीत सिंह, पद्मनी, दुर्गाबाई।।

अरे अधर्मी इन पापों का बदला अभी चखाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

किसने श्री रणजीत सिंह के बच्चों को कटवाया था।
शाह जफर के बेटों के सर काट उन्हें दिखलाया था।।

अजनाले के कुएं में किसने भोले भाई तुपाया था।
अच्छन खां और शम्भु शुक्ल के सर रेती रेतवाया था।।

इन करतूतों के बदले लंदन पर बम बरसाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

पेड़ इलाहाबाद चौक में अभी गवाही देते हैं।
खूनी दरवाजे दिल्ली के घूंट लहू पी लेते हैं।।

नवाबों के ढहे दुर्ग, जो मन मसोस रो देते हैं।
गांव जलाये ये जितने लख आफताब रो लेते हैं।।

उबल पड़ा है खून आज एक दम शासन पलटाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

अवध नवाबों के घर किसने रात में डाका डाला था।
वाजिद अली शाह के घर का किसने तोड़ा ताला था।।

लोने सिंह रुहिया नरेश को किसने देश निकाला था।
कुंवर सिंह बरबेनी माधव राना का घर घाला था।।

गाजी मौलाना के बदले तुझ पर गाज गिराऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

किसने बाजी राव पेशवा गायब कहां कराया था।
बिन अपराध किसानों पर कस के गोले बरसाया था।।

किला ढहाया चहलारी का राज पाल कटवाया था।
धुंध पंत तातिया हरी सिंह नलवा गर्द कराया था।।

इन नर सिंहों के बदले पर नर सिंह रूप प्रगटाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

डाक्टरों से चिरंजन को जहर दिलाने वाला कौन ?
पंजाब केसरी के सर ऊपर लट्ठ चलाने वाला कौन ?

पितु के सम्मुख पुत्र रत्न की खाल खिंचाने वाला कौन ?
थूक थूक कर जमीं के ऊपर हमें चटाने वाला कौन ?

एक बूंद के बदले तेरा घट पर खून बहाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

किसने हर दयाल, सावरकर अमरीका में घेरवाया है।
वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र से प्रिय भारत छोड़वाया है।।

रास बिहारी, मानवेन्द्र और महेन्द्र सिंह को बंधवाया है।
अंडमान टापू में बंदी देशभक्त सब भेजवाया है।।

अरे क्रूर ढोंगी के बच्चे तेरा वंश मिटाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

अमृतसर जलियान बाग का घाव भभकता सीने पर।
देशभक्त बलिदानों का अनुराग धधकता सीने पर।।

गली नालियों का वह जिंदा रक्त उबलता सीने पर।
आंखों देखा जुल्म नक्श है क्रोध उछलता सीने पर।।

दस हजार के बदले तेरे तीन करोड़ बहाऊंगा।
जब तक तुझको मिटा न लूँगा, चैन न कहीं मैं पाऊँगा।।

     जय माँ भारती !.............जय मातृभूमि की !!

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Saturday, 20 May 2017

हिन्दुस्तान तो होगा पाकिस्तान नहीं होगा......

किसी सुन्दरी के श्रृंगार के बन्द नही लिख सकता मैं।
हास्य,विरह व करुणा के छन्द नही लिख सकता मैं।।

जब आंखों मे बसीं तस्वीरें उन वीरों के शहादत की।
तो-अब भ्रमर बन पुष्पों की सुगन्ध नहीं लिख सकता मैं।।

देश की रक्षा करते करते निज प्राणों को भी वार दिया।
वतन के वीर जवानों ने अपना सर्वस्व निसार दिया।।

मध्य रात्रि चोरी से छिपकर दुश्मन ने है वार किया।
तब घात लगाकर हमला करके पीछे से आ मार दिया।।

एक मास मे पांच बार है संघर्ष विराम जो तोड रहे।
इस पापी नापाक पाक को क्यों अब भी हो छोड रहे।।

अरे-आदेश थमा दो सेनाओं को अब भी क्यों मुंह मोड रहे।
अब क्यों नही जरदारी शरीफ की गर्दन न जाय मरोड रहे।।

मुठ्ठी भर कुत्तों को शामिल करके शेरों को ललकारा है।
किसके बहकावे मे आकर फिर हिन्दुस्तान को ललकारा है।।

संसद की सरकार अगर थोडी सी हिम्मत कर जाये।
अबकी एक बार हमला करने को सहमत कर जाये।।

सौगन्ध शहीद वीर जवानों की द्रृश्य बदल अब जायेगा।
इस्लामाबाद,काश्मीर,करांची तक ये तिरंगा लहरायेगा।।

अबकी युद्ध हुआ गर तो अब नरसंहार बडा भीषण होगा।
दुनिया से पाक मिटाने को यही हर सैनिक का प्रण होगा।।

नापाक पाक को काट काटकर वायस श्रगाल खिलायेंगे।
इन्दुस सतलज चेनाब से हम तेरे लहू की धार बहायेंगे।।

काटे थे शीश जवानो के तो इसका हश्र बडा दुखदायी होगा।
ये अपना वजूद मिटाने का अब तू खुद ही सौदायी होगा।।

वो दो वीरों के शीश नही थे वो भारत मां की आन थी।
देश प्रेम का लहू था उनमे सेवा मे बसती जान थी।।

अब उन दो शीशों के बदले मे हम दो हजार उतारेंगे।
बाकी को शीश सहित ही हम घर घर मे जाकर मारेंगे।।

तेरा सबकी आंखों के आगे ही तब अंतिम वो क्षण होगा।
तेरा नक्शे से नाम मिटाने को ये बिना रुके ही रण होगा।।

उस युद्ध अंत मे यह तय है कि तब शमशान वहीं होगा।
पूरी दुनिया के नक्शे मे ही फिर पाकिस्तान नही होगा।।

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Ajitgarh, Sikar (Rajasthan)

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Manish Saini
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Thursday, 18 May 2017

भारतीय नारियों की गौरव......झाँसी की रानी

रानी   थी   वह   झांसी   की।
पर   भारत   जननी   कहलाई।।

स्वातंत्र्य   वीर   आराध्य   बनी।
वह   भारत   माता   कहलाई।।

मन   में   अंकुर   आजादी   का।
शैशव   से   ही   था   जमा   हुआ।।

यौवन   में   वह   प्रस्फुटित   हुआ।
भारत   भू   पर   वट   वृक्ष   बना।।

अंग्रेजों   की   उस   हड़प   नीति   का।
बुझदिल   उत्तर   ना   दे   पाए।।

तब   राज   महीषी   ने   डटकर।
उन   लोगों   के   दिल   दहलाए।।

वह   दुर्गा   बनकर   कूद   पड़ी।
झांसी   का   दुर्ग   छावनी   बना।।

छक्के   छूटे   अंग्रेजों   के।
जन   जागृति   का   तब   बिगुल   बजा।।

संधि   सहायक   का   बंधन।
राजाओं   को   था   जकड़   गया।।

नाचीज   बने   बैठे   थे   वे।
रानी   को   कुछ   संबल   न   मिला।।

कमनीय   युवा   तब   अश्व   लिए।
कालपी   भूमि   पर   कूद   पड़ी।।

रानी   थी   एक   वे   थे   अनेक।
वह   वीर   प्रसू   में   समा   गई।।

दुर्दिन   बनकर   आए   थे   वे।
भारत   भू   को   वे   कुचल   गए।।

तुमने   हमको   अवदान   दिया।
वह   सबक   सीखकर   चले   गए।।

है   हमें   आज   गरिमा   गौरव।
तुम   देशभक्ति   में   लीन   हुई।।

जो   पंथ   बनाया   था   तुमने।
हम   उस   पर   ही   आरूढ़   हुए।।

हे  देवी!   हम   सभी   आज।
व्याकुल   हैं   नत   मस्तक   हैं।।

व्यक्तित्व   तुम्हारा   दिग्दर्शक।
पथ   पर   बढ़ने   को   आतुर   हैं।।